हिजाब के बहाने नागरिक आज़ादियों को कुचलने की कोशिश

हिजाब प्रकरण देश भर में पसरता जा रहा है। यह महज एक तत्‍कालीन राजनीतिक खुराफात है या कोई सोची समझी दूर की साजिश? कुछ ऐसे ही सवाल इन दिनों फिजां में तैर रहे हैं। कई तरह के विचार-मीमांसा सामने आते जा रहे हैं। सोशल मीडिया में तो जैसे इस तरह के पोस्‍ट की बाढ़ आ गई है। झारखंड फोरम ने उनमें से कुछ चुनिंदा पोस्‍ट को अपने पाठकों तक पहुंचाने का फैसला लिया है। इसी क्रम में यहां पेश है व्‍हाट्सऐप ग्रुप 'हम देखेंगे झारखंड' द्वारा जारी यह पोस्‍ट जिसे जनवादी लेखक संघ (जलेस) के सचिव एम जेड खान ने अपने एकाउन्‍ट से जारी किया है। एक बार तो पढ़ना लाजिमी है..

देश भर के हम लेखक-कलाकार कर्नाटक में हिजाब पहनने के कारण मुसलमान लड़कियों को डराने-धमकाने, उत्पीड़ित करने और उन्हें शिक्षा के अधिकार से वंचित करने की शर्मनाक कोशिशों के प्रति अपना गहरा क्षोभ प्रकट करते हैं।

हम लड़कियों के अपनी मनमर्जी की पोशाक पहनने के अधिकार का पुरज़ोर समर्थन करते हैं और इस समय हिजाब पहनने की मांग करनेवाली लड़कियों के साथ अपनी एकजुटता ज़ाहिर करते हैं।

भारत में सदियों से महिलाएं सिर के बालों को ढंकने के लिए हिजाब, दुपट्टे या साड़ी के पल्लू का इस्तेमाल करती आई हैं। हिजाब को लेकर उठा नया विवाद हिंदुस्तान में अल्पसंख्यकों के ग़ैरीकरण की लगातार चल रही प्रक्रिया का नया हिस्सा है। 

इस प्रक्रिया की शुरुआत हिंदूराष्ट्र-वादी पार्टियों के द्वारा बाबरी-मस्जिद के विध्वंस और चोरी-चुपके रखी गई मूर्तियों के नाम पर मंदिर निर्माण पर चले अयोध्या आंदोलन से हुई थी। बहुत-से उदारचेता उदारवादी लोगों का ख्याल था कि बाबरी मस्जिद की जगह मंदिर के निर्माण की मांग अनैतिक और अवैध होते हुए भी इसलिए स्वीकार कर ली जानी चाहिए कि उसके बाद हिंदूवादी सांप्रदायिक तत्वों के हाथ से मुद्दा छिन जाएगा और देश में सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक आज़ादी का माहौल फिर से क़ायम किया जा सकेगा।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं ने सभी के सामने यह साफ़ कर दिया है कि हिंदू सांप्रदायिक फ़ासीवादी तत्त्वों के साथ समझौता करते हुए लोकतंत्र के रास्ते पर एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता। 

अयोध्या के बाद अब काशी और मथुरा को भी हिंदू राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में सांप्रदायिक विभाजन को गहरा करने की रणनीति के तहत विकसित किया जा रहा है। बात यहां तक बढ़ी है कि गुड़गांव जैसे अनेक शहरों में मुसलमानों को उन तमाम जगहों पर नमाज़ पढ़ने से भी रोका जा रहा है, जहां वे परंपरागत रूप से सद्भावपूर्ण वातावरण में नमाज़ पढ़ते आए थे।

अल्पसंख्यक विरोधी नागरिकता क़ानून के ज़रिए भी उन्हें दूसरे दर्जे की नागरिकता में धकेलने की कोशिश की गई। इसके विरोध में उठ खड़े हुए राष्ट्रव्यापी आंदोलन को सरकारी और ग़ैर-सरकारी एजेंसियों की हिंसा के ज़रिए दबाने की कोशिश की गई। सत्ताधारी पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं ने अल्पसंख्यकों को उनकी पोशाक के कारण निशाना बनाया। चुनावी रैलियों में हिंदुत्व के नाम पर सांप्रदायिकता का ज़हर बोने की कोशिशें लगातार की गईं। 

आज सिर के बाल ढंकने के अधिकार की मांग करने पर भी मुसलमान लड़कियों को देशद्रोही और आतंकी ठहराया जा रहा है। अल्पसंख्यकों के ग़ैरीकरण के ज़रिए फ़ासीवादी निज़ाम क़ायम करने की मंशा के अलावा इस अभियान के पीछे सक्रिय पितृसत्तावादी मंसूबों को भी आसानी से पहचाना जा सकता है।

हिजाब पहननेवाली लड़कियों को उत्पीड़ित करनेवाले तत्व उसी राजनीतिक कुनबे के हैं, जिसने सालों जींस पहननेवाली और वैलेंटाइन डे पर अपने मित्रों के साथ दिखाई पड़नेवाली लड़कियों को भी अपमानित करने की कोशिश की है। परम्परा, बहुमतवाद और कथित राष्ट्रीय एकरूपता के नाम पर नागरिक आज़ादियों और सांस्कृतिक विविधताओं को कुचलने की कोशिशें की जाती रही हैं। यह स्कूल यूनिफ़ॉर्म का मुद्दा नहीं है, क्योंकि सिर के बाल ढंकना, पगड़ी पहनना या बिंदी-सिंदूर जैसे चिह्न धारण करना यूनिफ़ॉर्म का हिस्सा नहीं है।

कर्नाटक में जो कुछ हो रहा है, वह दक्षिण भारत में हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला खोलने की एक लंबी योजना का हिस्सा जान पड़ता है। यह अकारण नहीं है कि कर्नाटक के अगले चुनाव के साल भर पहले से अल्पसंख्यक-विरोधी घृणा का एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जो पहले कभी देखा नहीं गया था। ऐसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं, जो पहले कभी सुने नहीं गए थे।

यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि ग़ैरीकरण की इन कोशिशों को केवल बढ़ती बेरोज़गारी, ग़रीबी और ग़ैरबराबरी के मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश के रूप में नहीं देखा जा सकता। वस्तुस्थिति यह है कि हिंदूराष्ट्रवादी राजनीति बेरोज़गारी और ग़रीबी के मुद्दों को अपने समर्थकों के ध्यान से ग़ायब करने में क़ामयाबी हासिल कर चुकी है। इन मुद्दों की अब कोई चिंता या गरज हो, ऐसा नहीं जान पड़ता है।

हिंदुत्ववादी राजनीति इस समय केवल अल्पसंख्यक-विरोधी घृणा और ग़ैरीकरण को एक स्थायी राजनीतिक एजेंडे के रूप में विकसित करने में लगी हुई है। उसे उम्मीद है कि इस अभियान के सफल होने पर  हिंदू के नाम पर इस देश के समूचे राजनीतिक मैदान पर आसानी से क़ाबिज़ हो जाएगी। राहत की बात यह है कि बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय से आनेवाली युवा पीढ़ी ने इस राजनीतिक साज़िश को अच्छी तरह पहचान लिया है। वह सीएए विरोधी आंदोलन से लेकर हिजाब के विवाद तक मज़बूती से हिंदूराष्ट्रवादी तत्वों के ख़िलाफ़ उत्पीड़न की शिकार लड़कियों और आम लोगों के साथ खड़ी है। 

हम सभी लेखक-कलाकार प्रतिरोध की तमाम जनवादी आवाज़ों  के साथ अपनी आवाज़ मिलाते हुए आम जनता से नफ़रती हिन्दूराष्ट्रवाद के खिलाफ़ भगतसिंह, आंबेडकर, महात्मा गाँधी और कवींद्र रवींद्र के भारतीय स्वप्न की रक्षा के संघर्ष में शामिल होने  का आह्वान करते हैं।

- जारीकर्ता
हम देखेंगे:राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान

SEO Title
Attempt to crush civil liberties on the pretext of Hijab