Report

Big Reports / Essay under Articles

कोवैक्सीन के लिए ईयूएल को मंजूरी नहीं देने के डब्ल्यूएचओ के फैसले पर AIPSN की चिंता

by jForum Team on Thu, 09/30/2021 - 20:58

वैज्ञानिकों के एक राष्ट्रीय नेटवर्क ऑल इंडिया पीपल्स साइंस नेटवर्क (AIPSN) ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) द्वारा आईसीएमआर-भारत बायोटेक के कोवैक्सिन के लिए आपातकालीन उपयोग सूची प्रदान नहीं करने पर चिंता व्यक्त की है।

ऑल इंडिया पीपल्स साइंस नेटवर्क (एआईपीएसएन) ने सरकार, संबंधित मंत्रालयों और विभागों से क्लिनिकल परीक्षण के परिणामों के संचालन और विश्लेषण के लिए वैज्ञानिक मानकों का पालन करने और सहकर्मी-समीक्षा लेखों के रूप में परिणामों के प्रकाशन और पूर्ण पारदर्शिता का आग्रह किया है।

डब्ल्यूएचओ ने नहीं दी मंजूरी

मोदी सरकार के 4 साल में भारत हुआ पड़ोसियों से दूर

by admin on Sat, 05/26/2018 - 15:16

नई दिल्ली: आज से लगभग चार साल पहले जब भाजपा सत्ता में आई थी, तो सरकार ने 'पड़ोसी प्रथम' का नारा दिया था। सरकार की मंशा पड़ोसियों को अधिक तवज्जो देकर रिश्ते बेहतर करने की थी, लेकिन अब जब सरकार अपने कार्यकाल के चार साल पूरे करने जा रही है तो पलटकर देखने की जरूरत है कि हमारे पड़ोसियों ने हमसे दूरी क्यों बना ली? 

मोदी सरकार के 4 साल : महिला सुरक्षा बनी जी का जंजाल

by admin on Sat, 05/26/2018 - 15:14

नई दिल्ली: साल 2014 में भाजपा महिला सुरक्षा का वादा कर सत्ता में आई थी, जो पार्टी के घोषणापत्र से साफ झलकती है, लेकिन क्या कठुआ, उन्नाव और शिमला जैसे दुष्कर्म मामलों को देखकर लगता है कि सरकार इन चार वर्षो में अपने उन वादों पर खरी उतरी है या महिला सुरक्षा सरकार के लिए जी का जंजाल बनी हुई है? 

इस मुद्दे पर विशेषज्ञों और समाजसेवियों की राय बंटी हुई है। कुछ मानते हैं कि सरकार के महिला सुरक्षा के दावे सिर्फ फाइलों तक ही सिमटे रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि इन वर्षो में सरकार महिलाओं के लिए काम कर पाई है। 

स्‍थायी नौकरियां खत्‍म होंगी, बचेंगे ठेका..!

by admin on Thu, 11/09/2017 - 18:33

नई दिल्ली : 9 से 5 की शिफ्ट के साथ-साथ सालाना वेतन वृद्धि, रिटेंशन बोनस और अच्छी-खासी संख्या में कैजुअल और प्रिवलेज लीव्स (सीएल और पीएल) जल्द ही बीते दिनों की बातें हो सकती हैं। नियुक्तियों और कामकाज के तरीकों में तेजी से बदलाव हो रहे हैं क्योंकि कंपनियां लागत घटाने और ऑटोमेशन जैसी नई तकनीकों को अपनाने की जरूरत महसूस कर रही हैं। पर्मानेंट जॉब्स या तीन से पांच साल तक के कॉन्ट्रैक्ट्स का फलसफा धीरे-धीरे मिट जाएगा। 

लोकप्रियता के शिखर पर पहुंची उपेक्षित खिचड़ी

by admin on Tue, 11/07/2017 - 19:20

नई दिल्ली: खिचड़ी का नाम सुनकर अब नाक-भौंह सिकोड़ने की आदत बदलनी पड़ेगी, क्योंकि खिचड़ी विश्व रिकॉर्ड बनाकर गिनीज बुक में नाम दर्ज करा चुकी है। सरकार इसे राष्ट्रीय आहार का दर्जा देने पर विचार भी कर सकती है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो अब इस शोषित, दलित खिचड़ी का सशक्तिकरण हो चुका है। 

मार्क टुली : पत्रकारिता से कथा लेखन की ओर

by admin on Tue, 11/07/2017 - 18:39

नई दिल्ली: अधिकांश भारतीयों से भी ज्यादा भारतीय परिवेश में रचे-बसे सर मार्क टुली का लालन-पालन भले ही अंग्रेजियत के साथ हुआ, लेकिन उनको भारत से लगाव बचपन से ही रहा है। 

जीवन के अस्सी से ज्यादा वसंत देख चुके जानेमाने ब्रॉडकास्टर व लेखक कभी पादरी बनने की आकांक्षा रखते थे और इसके लिए उन्होंने धर्मशास्त्र में डिग्री भी हासिल की। लेकिन बाद में घटनाक्रम कुछ ऐसा बदला उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा। टुली बताते हैं कि पत्रकारिता उनकी पसंद नहीं थी, लेकिन नियति को यही मंजूर था और भारत जो शुरू में उनको पहचान नहीं दिला पाया आज वही उनका घर है। 

आदिवासी महिलाशक्ति के डर से भागे वन-माफिया

by admin on Mon, 11/06/2017 - 09:30

जमशेदपुर: पानी की बोतलों और डंडों से लैस आदिवासी महिलाओं का यह समूह झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले स्थित मुतुर्खुम गांव का है, जो अपने आसपास की साल के जंगलों में मीलों पैदल चलती हैं। इनका मसकद जंगलों को वन-माफिया की लूट से को बचाना है। 

राजनैतिक प्राथमिकता बनने के इंतज़ार में झारखंड के मनरेगा मज़दूर

by admin on Sun, 11/05/2017 - 13:07

राज्य के काम करने वाली जनसँख्या से अन्य राज्यों में पलायन करने वाले लोगों का अनुपात 2015-16 में देश में सबसे अधिक झारखंड का था। रघुवर दास सरकार ने रोज़गार के प्रति अपनी सोच को दर्शाने के लिए एक नया नारा  दिया है – “हर हाथ को काम”। लेकिन पिछले तीन वर्षो में झारखंड के मनरेगा मज़दूरों के समय पर काम व भुगतान के अधिकारों का व्यापक स्तर पर उलंघन इस सरकार की रोज़गार के प्रति उदासीन रवैये को दर्शाती है।