देश में वंशानुगत जंजीरों में जकड़े संताली समाज को मुक्‍त कराइये राष्‍ट्रपति महोदय : सेंगेल अभियान

by admin on Wed, 03/16/2022 - 10:29

आदिवासी सेंगेल अभियान का मानना है कि भारत के आदिवासी संताल समाज में व्याप्त वंशानुगत माझी-परगाना स्वशासन व्यवस्था जाने- अनजाने झारखंड, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम आदि प्रदेशों में संताल समाज को गुलामी की जंजीरों में कैद कर रखा है। यह रूढ़िवादी राजतांत्रिक व्यवस्था भारतीय संविधान, कानून, मानवाधिकारों और जनतांत्रिक प्रक्रियाओं और मूल्यों के खिलाफ खड़ा है। यह व्यवस्था अधिकांश संताल गांव- समाज को पंगु और गुलाम बनाकर रखा है। जिसे निरंकुश और तुगलकी राजा की तरह माझी- परगाना चला रहे हैं। आदिवासी संताल समाज में विद्यमान इस आत्मघाती व्यवस्था की तुलना सती प्रथा के साथ की जा सकती है। अतएव भारत सरकार, संबंधित राज्य सरकारों और सभी संवेदनशील संस्थानों से राष्ट्रहित में इसकी त्वरित जांच और सुधार में सहयोग के लिए आगे आना चाहिए। इस प्रसंग में सेंगेल के अध्‍यक्ष सालखन मुर्मू ने राष्‍ट्रपति को एक पत्र लिखकर गुहार लगायी है। पत्र में विस्‍तार से बातें रखते हुए मुर्मू कहते हैं, भारत देश यद्यपि 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हो गया है और 26 जनवरी 1950 से संवैधानिक गणतंत्र को अपना लिया है। परंतु दुर्भाग्य एक बहुत बड़ी संताल- आदिवासी आबादी को वंशपरंपरागत माझी- परगाना स्वशासन व्यवस्था ने कमजोर बना दिया है। प्रत्येक संताल गांव के लिए एक माझी या प्रधान और अनेक गांवों के लिए एक पारगाना या क्षेत्रीय प्रधान होते हैं। आदिवासी समाज में पारंपरिक रूप से विद्यमान स्वशासन पद्धति के ग्राम प्रधान या माझी-परगाना आदि अब तक वंशपरंपरागत नियुक्त होते हैं। अंततः लगभग सभी अशिक्षित, नशा करनेवाले, संविधान,कानून से अनभिज्ञ होते हैं। देश दुनिया की बातों से भी बेखबर होते हैं। इनको नशापान, अंधविश्वास (डायन प्रथा), ईर्ष्या- द्वेष को खत्म करने, हँड़िया- दारु-चखना, रुपयों आदि में वोट की खरीद-बिक्री को रोकने और वंश परंपरागत पद्धति को गुणात्मक जनतांत्रिकरण द्वारा ठीक करने में कोई दिलचस्पी नहीं होती है। इनको समाज हित में हासा (भूमि)- भाषा, जाति (ST), धर्म (सरना), इज्जत, आबादी, रोजगार, चास-बास आदि से कोई मतलब नहीं है।  इन्हें तो बस खाना- पीना चाहिए। इसीलिए आदिवासी केंद्रित झारखंड प्रदेश ( 15.11.2000 ) पाकर और सर्वाधिक बड़ी आदिवासी भाषा - संताली भाषा 8वीं अनुसूची ( 22.12.2003 ) में शामिल होकर भी आदिवासी को अबतक कोई फायदा नहीं हुआ है।  वंशपरंपरागत व्यवस्था के दबंगाई के कारण गांव- गांव में शिक्षित आदिवासी स्त्री- पुरुषों की उपस्थिति के बावजूद कोई सुधार नहीं हो रहा है और स्वशासन के नाम पर डंडोम (जुर्माना), बारोंन (सामाजिक बहिष्कार), डॉन पनते (डायन की खोज) आदि संविधान, कानून विरोधी क्रियाकलाप जारी हैं। जंगल रूल के तहत जोरजबरदस्ती उठाए  डंडोम या जुर्माना के हजारों/ लाखों रुपयों को माझी- परगना के नेतृत्व में ग्रामीणों द्वारा हंड़िया- दारू, मास- भात खा कर मौज किया जाता है। इस प्रकार निर्दोष, गरीब, कमजोर, मजबूर आदिवासी गांव- गांव में अन्याय, अत्याचार, शोषण के शिकार हो रहे हैं। आदिवासी समाज में डायन नहीं है किंतु डायन बनाने वालों में अधिकांश सभी गाँव मे शामिल आदिवासी स्वशासन के प्रमुखों का हाथ होता है। अंजाम निर्दोष आदिवासी महिलाओं के साथ घोर शोषण और जुल्म जारी है। मोब लिंचिंग चालू है। अंततः आदिवासी समाज में स्वशासन के नाम पर स्वशोषण चालू है। आजादी और जनतंत्र की जगह गुलामी और राजतंत्र चालू है।

(2) आदिवासी सेंगेल  अभियान का मानना है कि आदिवासी अपनी आंतरिक कमजोरियों (नशापान, अंधविश्वास- डायन प्रथा, ईर्ष्या- द्वेष, राजनीतिक कुपोषण, आदिवासी महिला विरोधी मानसिकता, राजतांत्रिक स्वशासन व्यवस्था आदि) के कारण गुलामी की जीवन जीने को विवश है। एक प्रकार से यह स्वपोषित गुलामी या self-imposed slavery की जाल में खुद फंसा हुआ है। अतः संविधान, कानून, मानवाधिकार, जनतांत्रिक मूल्यों और गुलामी से आजादी के लिए आदिवासी स्वशासन माझी- परगाना व्यवस्था में अविलंब जनतांत्रिक सुधार जरूरी है। यह सुधार राष्ट्रहित, जनहित, आदिवासी हितों में अनिवार्य है। इसकी अनुपस्थिति में अधिकांश आदिवासी भ्रमित होकर नक्सलवाद, उग्रवाद, पत्थलगड़ी आंदोलन, देश विरोधी आंदोलन, पेसा (पंचायत) कानून-1996 चुनाव बिरोधी आंदोलन, कोल्हान अलग राष्ट्र आंदोलन आदि को समर्थन करने लगते हैं। जो आदिवासी हितों के बिल्कुल खिलाफ है। आदिवासी संताल समाज में विद्यमान यह आत्मघाती व्यवस्था सती प्रथा के समान  है। महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ आंदोलन जरूर खड़ा किया था मगर अंग्रेजी शासन और लॉर्ड विलियम बेंटिक के सहयोग के बगैर यह आसान नहीं था। राजा राममोहन राय की प्रेरणा से सती प्रथा के खिलाफ अंग्रेजी हुकूमत ने 1829 में कानून बनाया तभी सती प्रथा रुक सका है। आज अंग्रेजों की जगह भारतीय हुकूमत है,संविधान कानून है, पुलिस प्रशासन है। मगर यदि केंद्र और राज्य सरकारें तथा स्थानीय पुलिस प्रशासन पूरी संवेदनशीलता और संवैधानिक मर्यादाओं के साथ सहयोग नहीं करेंगे तो यह सती प्रथा की तरह आदिवासी संताल माझी- परगना स्वशासन व्यवस्था जानलेवा साबित होते रहेगा।  अतः इसका अविलंब खात्मा जनहित  में जरूरी है।

(3)  डायन प्रथा आदिवासी गांव समाज में झारखंड, बंगाल, बिहार ,उड़ीसा , असम आदि प्रांतों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों और खासकर संताल समाज में वृहद स्तर पर व्याप्त है। यह अंधविश्वास से ज्यादा आदिवासी गांव समाज की व्याप्त स्वशासन शक्ति का दुरुपयोग, लोभ- लालच और  विकृत मानसिकता का प्रतिफल है। डायन हिंसा की घटनाओं के पीछे घटित आदिवासी महिलाओं की हत्या, हिंसा, प्रताड़ना, निर्वस्त्र कर गांव में घुमाना, दुष्कर्म करना, मैला पिलाना आदि के खिलाफ अधिकांश शिक्षित- अशिक्षित पुरुष- महिला आदिवासी चुप रहते हैं। अधिकांश आदिवासी सामाजिक- राजनीतिक संगठनों के अगुआ और आदिवासी स्वशासन के प्रमुख ( माझी- परगना ) आदि भी ऐसे घिनौने, हैवानियत से भरे अमानवीय कृतियों का विरोध करने की बजाय अप्रत्यक्ष रुप से सहयोग करते दिखाई पड़ते हैं। यह संविधान- कानून द्वारा संचालित भारतीय जनजीवन में मानवीय गरिमा, न्याय और शांति के रास्ते पर आतंकवादी हमले की तरह एक अहम चुनौती है। यह ईर्ष्या द्वेष,स्वार्थ, बदले की भावना, जमीन- जायदाद हड़पने आदि कारणों से भी घटित होती है। इसे दूर करने में सभी जिलों के पुलिस- प्रशासन के मार्फत सरकार और सिविल सोसाइटी, सभी सामाजिक - राजनीतिक संगठनों, बार एसोसिएशन, मीडिया, बुद्धिजीवियों और प्रबुद्ध नागरिकों का सहयोग अपेक्षित है। उसी प्रकार आदिवासी गांव- समाज में जरूरी सुधारों को सबका सहयोग मिले ताकि मर्यादा के साथ जीने के मौलिक अधिकारों से आदिवासी गांव- समाज वंचित न हो।

(4) आदिवासी संताल समाज में तथाकथित माझी- परगाना स्वशासन व्यवस्था का नारा है - हम जैसे थे वैसे ही रहेंगे (अबो दो सेदाय लेका गे )।समाज में राजनीति नहीं करेंगे  ( आबो दो  non-political )। न लोकसभा न विधानसभा, सबसे ऊंचा ग्रामसभा अर्थात हम संविधान, कानून और संसद, विधानसभा से भी बड़े हैं। हम पुलिस- प्रशासन और सरकार को नहीं मानेंगे आदि आदि। आदिवासी गांव - समाज के अधिकांश लोग वोट क्योँ देना है, किसको देना है, वोट के बदले क्या मांगना है? सरकार, सत्ता, पार्टी, जनप्रतिनिधि आदि का ठीक मतलब नहीं समझते हैं।  आदिवासी गांव- समाज में वोट और राजनीति की बात करना वर्जित है। वोट को हंड़िया दारू चखना, धोती साड़ी, रुपयों में खरीद- बिक्री की परंपरा है। अंततः पूरा गांव- समाज भ्रम की हालात में जीने को मजबूर है। माझी- परगाना अपने को किसी दबंग और तानाशाही राजा से कम नहीं समझते हैं। चूँकि उनके गांव- समाज की प्रजा को छठीयारी (बच्चे के जन्म पर), शादी-विवाह, दफ़नाने/मुखाग्नि, श्राद्ध, ग्रामीण पूजा-पाठ, पर्ब- त्यौहार और ग्राम-पंचायती (दोरबार) में ग्राम प्रधान या माझी परगाना के आदेश, उपस्थिति और आशीर्वाद की अनिवार्यता रहती है। अतः संताल गांव - समाज के प्रजा को पंगु बनकर माझी परगाना के अधिकांश गलत फैसलों और आदेशों का भी पालन करते हुए गुलाम की तरह जीना पड़ता है। जो सिस्टमैटिक (व्यवस्थित) रूप से अब तक चालू है। गांव समाज में पढ़े लिखे लोगों के  लिए यह डर और मजबूरी का आलम है। प्रत्येक आदिवासी गांव- समाज में ग्राम प्रधान या माझी बाबा सोशल इंजन की तरह है और जब खुद इंजन ही नशे में धुत होकर दिशाहीन हो जाए तब डब्बों का विनाश तय है।

( उपरोक्त तथ्यों की पुष्टि के लिए 18 दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का विवरण,कुछ संबंधित पत्र, रिपोर्ट, फ़ोटो, न्यूज़ क्लिपिंग आदि संलग्न किये जा रहे हैं।)

(5) सुझाव : 

¡) भारत सरकार एक उच्चस्तरीय कमीशन या कमेटी बनाकर वर्तमान आदिवासी स्वशासन व्यवस्था की जांच कर अविलंब सुधारात्मक कार्रवाई करें।
¡¡) राजतांत्रिक और गुलामी को बढ़ाने वाली वर्तमान आदिवासी स्वशासन व्यवस्था को प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष प्रोत्साहित करनेवाले सभी संगठनों को चिन्हित कर बैन और दंडित किया जाए। क्योंकि कुछ आदिवासी सामाजिक संगठन ईर्ष्या -द्वेष और निजी स्वार्थों के कारण आदिवासी संताल समाज को हमेशा अंधकार के गर्त में रखना चाहते हैं। झारखंड में एक नामचीन संताल परिवार अपनी राजनीतिक स्वार्थों के लिए आदिवासियों के बीच चालू व्यवस्थागत गुलामी मानसिकता का फायदा उठाकर पूरे आदिवासी संताल समाज को लगभग 4 दशकों से बर्बादी की कगार पर खड़ा कर दिया है और खुद मौज उड़ा रहा है।
¡¡¡) गुणात्मक जनतांत्रिक रूप से चुने गए माझी- परगना आदि को सरकारी मान्यता मिले तथा उचित सरकारी भत्ता प्रदान किया जाए। किंतु वंशानुगत (राजतांत्रिक) व्यवस्था और गुलामी को आगे बढ़ाने वाले माझी- परगना आदि को भत्ता नहीं दिया जाए।
¡v) जिला पुलिस -प्रशासन आदि यदि आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के नाम पर चालू असंवैधानिक, गैर कानूनी, अमानवीय क्रियाकलापों को अपनी लापरवाही और संवेदनहीनता के कारण से रोकने में अक्षम होते हैं तो उन्हें दंडित किया जाए। मगर त्वरित सकारात्मक कार्यवाही करने वालों को यथोचित पुरस्कृत किया जाए। जिला पुलिस- प्रशासन बहुधा ऐसे मामलों को सामाजिक मामला बोलकर टाल देते हैं और मृतक माझी- परगाना के उत्तराधिकारी के रूप में बच्चों को भी माझी- परगाना आदि नियुक्त करने हैं। जो गलत है। 
v) ज्ञातव्य हो कि पांचवी अनुसूची क्षेत्र अर्थात शेड्यूल एरिया में ग्राम पंचायत का चुनाव अनुच्छेद 243 M (1) के तहत वर्जित था। तब भारत सरकार द्वारा नियुक्त दिलीप सिंह भूरिया कमेटी ने 1995 में शेड्यूल एरिया में भी ग्राम पंचायत चुनाव का प्रस्ताव प्रदान किया। चूँकि शेड्यूल एरिया में आदिवासी स्वशासन के प्रमुख (माझी- परगना, मानकी- मुंडा आदि) वंशानुगत हैं, जनतांत्रिक रूप से नहीं चुने जाते हैं। अंततः संविधान में 243 M 4(b) के तहत संशोधन हुआ और पेसा (PESA) पंचायत कानून -1996 शेड्यूल एरिया में भी अब 10 प्रदेशों में लागू है। जिसे माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी 2010 के अपने ऐतिहासिक फैसले में संवैधानिक और जरूरी बताया है। अतः दिलीप सिंह भूरिया कमिटी रिपोर्ट इस वास्तविक वस्तुस्थिति को प्रमाणित करता है कि आदिवासी स्वशासन पद्धति राजतांत्रिक है, जनतांत्रिक नहीं। अतः  इसका गुणात्मक जनतंत्रीकरण सुधार अविलंब अनिवार्य है। 

आदिवासी सेंगेल ( सशक्तिकरण ) अभियान, झारखंड,बंगाल,बिहार,
ओडिशा, असम आदि 5 प्रदेशों के आदिवासी बहुल जिलों में क्रियाशील है। मगर जिस प्रकार सती प्रथा की समाप्ति के लिये अंग्रेजी हुकूमत का सहयोग अनिवार्य था उसी प्रकार बिना पुलिस- प्रशासन और सरकारी सहयोग के आदिवासी  (संताल) समाज में यह समाज सुधार का काम बहुत कठिन बन जाता है। अतः राष्ट्रहित में हम  सबके त्वरित सहयोग के आकांक्षी हैं।

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