Opinion

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Bridging digital divide to accelerate India’s development

by admin on Wed, 03/16/2022 - 10:17

Gulf between those who have ready access to computing devices and Internet, and those who do not have, is generally known as digital divide. There is a digital divide between rich and poor in terms of use of computers. Digital divide denies half the world’s citizens access to digital education, work and participation in modern life. Without Internet access, people in vulnerable situations are suffering throughout pandemic driven school and work closures.

चुनाव अभियान के भटकाव ने हराया सपा को : प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर ने एक टीवी चैनल के साथ इंटरव्यू में कहा है कि बीजेपी को हराने के लिए 2-3 महीने की मेहनत काफी नहीं है। उन्होंने कहा कि कोई कितना भी करिश्माई नेता हो, 2-3 महीने पहले जाग कर बीजेपी को हराया नहीं जा सकता है।

World celebrates women’s day on March 8

by admin on Mon, 03/07/2022 - 11:09

International Women’s Day (IWD) is being celebrated all over the globe on March 8 every year. Theme of IWD-2022 is Break the Bias. Bias, whether deliberate or unconscious, makes it difficult for women to move ahead. It is not enough to recognize bias; action is required to level the playing field. Countries need to devise policies to end the bias so that women can prosper in different walks of life. There are statistics that show bias against women is extremely real. Governments are delivering; outcomes for women not so much.

The way Supreme Court caved-in

by admin on Thu, 02/24/2022 - 10:33

People assumed that after the judgment in ADM Jabalpur case in mid 1970s, the Supreme Court of India (SCI) would be a great bulwark standing in support of liberties and rights of people, but increasingly in recent years especially since 2014 on issues of critical fundamental constitutional importance like the Kashmir issue, electoral bonds, Habeas Corpus, CAA, SCI has been refusing to hear such cases, kicking the can down the road presumably because the apex court senses the outcome could embarrass the government. It is worrying that SCI is ducking its duty on constitutional issues.

चारा घोटाला और ‘साजिश का एंगल’

{ यह आलेख वर्ष 2018 में लिखा था, जब लालू प्रसाद को तीसरी बार चारा घोटाले के एक मामले में सजा सुनायी गयी थी. अब पांचवीं बार सजा मिलने पर भी, तब मैंने जो मुद्दे उठाये थे, अब प्रासंगिक हैं. इसलिए इसमें किंचित संपादन के अलावा किसी बदलाव की जरूरत नहीं लगी.}

हिजाब बनाम भगवा गमछा : यह  ‘संतुलन’ है या और कुछ?

कर्नाटक में अभी हिजाब बनाम भगवा गमछा का एक नकली विवाद खड़ा कर दिया गया है। भाजपा शासित इस राज्य के कुछ स्कूलों में पहले तो मुसलिम लड़कियों के हिजाब पहन कर आने से रोक दिया गया। जब इसे धार्मिक भेदभाव बता कर इसका विरोध शुरू हुआ तो कुछ लड़के वहां गले में  ‘भगवा गमछा’ डाल  कर पहुँच गये। तब प्रबंधन ने उनको भी स्कूल में प्रवेश करने से रोक दिया। यानी ‘संतुलन’ बन गया- हिजाब और भगवा गमछा दोनों पर रोक लग गयी। लेकिन क्या स्कूल प्रबंध या सरकार का रवैया सचमुच संतुलित, यानी भेदभाव से परे है?

हिजाब के बहाने नागरिक आज़ादियों को कुचलने की कोशिश

हिजाब प्रकरण देश भर में पसरता जा रहा है। यह महज एक तत्‍कालीन राजनीतिक खुराफात है या कोई सोची समझी दूर की साजिश? कुछ ऐसे ही सवाल इन दिनों फिजां में तैर रहे हैं। कई तरह के विचार-मीमांसा सामने आते जा रहे हैं। सोशल मीडिया में तो जैसे इस तरह के पोस्‍ट की बाढ़ आ गई है। झारखंड फोरम ने उनमें से कुछ चुनिंदा पोस्‍ट को अपने पाठकों तक पहुंचाने का फैसला लिया है। इसी क्रम में यहां पेश है व्‍हाट्सऐप ग्रुप 'हम देखेंगे झारखंड' द्वारा जारी यह पोस्‍ट जिसे जनवादी लेखक संघ (जलेस) के सचिव एम जेड खान ने अपने एकाउन्‍ट से जारी किया है। एक बार तो पढ़ना लाजिमी है..

पेसा कानून 1996 का विरोध करना आदिवासियों के संविधान प्रदत्त अधिकार का विरोध करना है- सालखन मुर्मू 

पेसा कानून- 1996 अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों को प्रदत्त  अहम अधिकार और शक्ति है। मगर कुछ आदिवासी संगठन इसका विरोध कर "नाच ना जाने आंगन टेढ़ा" वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। यह कानून वर्तमान में 10 प्रदेशों में लागू है। मगर सही नियमावली की अनुपस्थिति में यह जरूर कमजोर है। इसके लिए राज्य सरकारें दोषी हैं। झारखंड में दो बार पंचायत चुनाव हो चुके हैं। चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अधिकारों के लिए आंदोलन करना चाहिए था, माननीय हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए था। इन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। अब झारखंड में फिर चुनाव की प्रक्रिया अंतिम स्टेज में है। तब बुद्धिमानी यह है कि चुनाव लड़कर जी

Indian Railways on cost cutting spree

Ministry of Railways has begun implementing a report on right sizing the workings of Indian Railways by reorganizing its public sector undertakings (PSUs) including Special Purpose Vehicles (SPVs) through mergers of some units and closure of some others to avoid overlapping and to cut costs to effect economy of scale in rail services to the nation. The ongoing action is a sequel to a report by former Principal Economic Advisor Sanjeev Sanyal in the Ministry of Finance. Ministry of Railways has the largest number of PSUs and SPVs in the Union Government.

झारखण्ड के आदिवासियों का समाजवादी जीवन-दर्शन

सोवियत महल के विघटन के साथ ही समाजवाद का पतन शुरू हो गया और अब दुनिया के अधिकांश देशों से करीब-करीब विदा हो चुका है। संसदीय लोकतंत्र के आवरण में पूंजीवाद समस्त जगत में अपना पैंठ जमा चुका है। तथाकथित रूस और चीन जैसे साम्यवादी देशों से भी समाजवादी मूल्य गायब हो चुके हैं। मौजूदा समय में इन देशों में राज्य प्रायोजित पूंजीवादी व्यवस्था विद्यमान है। साम्यवाद के मुखौटे में ये दोनों देश भी पूंजीवादी ही हैं; मूल्य, विचार, दर्शन, उत्पादन-वितरण की प्रणाली का दूर-दूर तक समाजवाद-साम्यवाद से कोर्इ सरोकार नहीं है।